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Happy Valentine's Day

Happy Valentine's day
अरे..! ए कहने की तुम्हारी हिम्मत ..
अपनी सभ्यता, संस्कृति पर गर्व करने वाले तमाम लोगों को हर बार भारत की अखंडता, प्राचीनता, गौरव और उदारता बचाने के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद। आप लोग न होते तो हम कब के मिट चुके होते, आपके अथक प्रयासों से सब कुछ सामान्य ढंग से चल रहा है और वो जो आप लोग हर मामले में खतरे वाला ऐंगल ले आते हैं, वह तो लाजवाब है, अब किसी को रोजी-रोटी नहीं चाहिए, भाई इतना बड़ा खतरा जो सामने है, आज तो valentine day से वीरता पूर्वक संघर्ष किया गया, जबकि कुछ ही समय पहले पद्मावती को पद्मावत बनाने के बाद भी, देश की सुरक्षा खातिर, उसे मन माफिक जगहों पर बंधक बनाए रखा, आगे अपने कार्य को कुशलता से सम्पादित करने के लिए, आप लोगों की जो private army है, वह काफी अच्छा काम कर रही है, ए भी सच है कि आपकी स्वाभिमान यात्राओं के बिना, इतने सारे news channel बेकार हो जाएंगे और फिर tv चैनलों पर जब आप लोग वीर रस में हुंकार भरते हैं तो उस वक्त आपका सारा ज्ञान और संस्कार आपका चरण वंदन करने लगता है, अब इससे ज्यादा हमारे नवयुवकों को क्या चाहिए, कौन किताबों में सर खपाए जब अंतिम सत्…

भीड़ की अराजकता

किसी भी परिवार के लिए उसके प्रिय की मृत्यु से भयावह कुछ नहीं होता। पर हमारे यहाँ राजनीतक लक्ष्यों और मीडिया में बिकाऊ, मसालेदार, सबसे जल्दी कुछ भी परोसने की गजब कि प्रतिस्पर्धा है, जहाँ दूसरे पक्ष की कोई भी बात सुनने को तैयार ही नहीं है, पहले से ही सब तय है। अगर आप महिला, दलित, अल्पसंख्यक हैं तो आप पीड़ित ही हैं और ऐसे में आपको राष्ट्रीय ही अंतरराष्ट्रीय सहानुभुति भी मिल जाएगी और राजनीतिक दलों के सक्रिय होते ही, सरकारी रहमोकरम की बरसात शुरू हो जाएगी, बस एक ही समस्या है कि आप सजातीय, सधार्मिक दबंग से मत टकराइए क्योंकि तब यह उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं आएगा और यह बात ख़बर भी नहीं बनेगी, आप कितने भी बड़े लफंगे क्यों न हों, दबा, कुचला, बेचारे का टैग आप की ताकत है। अभी कटरा में चाय की दुकान पर बकइती हो रही थी, तब यही सर्व सम्मति बनी कि किसी भी झगड़े की शुरुआत बहस से शुरू होती है ऐसे में पहला सवाल यही होना चाहिए कि. .. कवन जाति ?? ? नहीं तो.. जानते ही हो भाई..  .. आगे पूरा शहर चपेटे में आ जाएगा.. ।
अभी एक छोटी सी खबर छपी कि इलाहाबाद शहर से तकरीबन 50 कि.मी.  दूर मांडा में दो सगे भाइयों को मामूली…

सावधान

आए दिन कहीं भी, किसी भी बात को लेकर, बहस हो ही जाती है, खासतौर पर भीड़ भाड वाली हर जगह पर धक्का मुक्की आम बात है, ऐसे में सामने वाला अगर आक्रामक निकला और कहीं संख्या में आपसे ज्यादा हो गया तो आपकी खैर नहीं .. इस तरह के लफंगे आए दिन कोई न कोई बारदात करते ही रहते हैं। फिर रही सही कसर मीडिया में विराजमान महा बुद्धिमान लोग खबर को बिकाऊ और चटखारे दार बनाने के लिए उसको जातीय, धार्मिक वाला ऐंगल जबरजस्ती लाएंगे, जबकि पूरी घटना सिर्फ आपराधिक वारदात होती है .. अब जाति के ठेकेदारों की भी हमदर्दी शुरू हो जाती है.. आगे .. तोड़-फोड़, बंद .. जिंदाबाद ... मुर्दाबाद .. हासिल किसको ..  क्या होगा??? बस हम इस मामले सिर्फ एक काम कर सकते हैं .. वह है दुआ .. कि जो व्यक्ति इन अपराधियों का शिकार हो वह दलित या अल्पसंख्यक समुदाय से न आता हो .. क्योंकि बाकियों कि ... जैसे देखना चाहिए वैसे ही देखा जाता है ..  कृपा करके अपराधियों को जातीय, धार्मिक पहचान मत दीजिए, कोई भी अपराधी खास तरह से कपड़े पहन लेने या कोई प्रतीक धारण कर लेने से किसी भी जाति, धर्म का प्रतिनिधि नहीं बन जाता बल्कि यह सिर्फ उसके अपने बचाव का एक रास्ता…

जातीय अस्मिता से, राजनीतिक अस्मिता हासिल करने की कोशिश

राजस्थान, हरियाणा .. महाराष्ट्र.. इसके बाद देखते हैं किसका नंबर आता है। सिर्फ़ facebook, what's app पर भरोसा मत करिए, थोड़े दूसरे स्रोतों को भी देख लीजिए, इतिहास, भूगोल की समझ नहीं है तो कोई बात नहीं, बस! भाई लोग थोड़ा सा Google कर लीजिए। फिलहाल latest issue पर आते हैं और अब जरा regiment के नामों पर गौर करिए जैसे राजपूत, सिख, मराठा, गोरखा,... महार, ए regiment अब भी हैं और आपको पता है ए सारी regiment देश के अलग-अलग जगहों पर भारतियों के खिलाफ लड़ी और जीती हैं, इनकी अपनी परम्पराएँ रही हैं और हमारी Indian Army अब भी उसे अपने तरीके से निभाती है, ऐसे में हर regiment के लिए अगर एक जातीय, धार्मिक संगठन ठेकेदार बन जाए तो ...  ।
हाँ! एक बात और अपनी जाति से चीजों को जोड़कर भावुक मत होइए क्योंकि तब आप सिर्फ भक्त रह जाएंगे। वैसे British Period में सेना की संरचना जातीय, धार्मिक अस्मिता के आधार पर ही किया गया था। जिससे किसी एक जातीय, धार्मिक समूह को दूसरे समूह से कुचला जा सके और ए सैनिक पूरी तरह से वैतनिक और अंग्रेज सरकार के प्रति वफादार होते थे और उस समय के यूरोपीय गोला, बारूद से लैस सबसे आधुनिक फौज…

OSHO

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झूठ अनेक, मगर सत्य! सिर्फ एक सत्य से दोस्ती कठिन  जीवन के हर आयाम में सत्य के सामने झुकना मुश्किल है और झूठ के सामने झुकना सरल। ऐसी उलटबांसी क्यों है? उलटबांसी जरा भी नहीं है; सिर्फ तुम्हारे विचार में जरा सी चूक हो गई है, इसलिए उलटबांसी दिखाई पड़ रही है। चूक बहुत छोटी है, शायद एकदम से दिखाई न पड़े, थोड़ी खुर्दबीन लेकर देखोगे तो दिखाई पड़ेगी। सत्य के सामने झुकना पड़ता है; झूठ के सामने झुकना ही नहीं पड़ता, झूठ तुम्हारे सामने झुकता है और इसीलिए झूठ से दोस्ती आसान है, क्योंकि झूठ तुम्हारे सामने झुकता है और सत्य से दोस्ती कठिन है, क्योंकि सत्य के सामने तुम्हें झुकना पड़ता है। अंधा अंधेरे से दोस्ती कर सकता है, क्योंकि अंधेरा आंखें चाहिए ऐसी मांग नहीं करता, लेकिन अंधा प्रकाश से दोस्ती नहीं कर सकता है, क्योंकि प्रकाश से दोस्ती के लिए पहले तो आंखें चाहिए। अंधा अमावस की रात के साथ तो तल्लीन हो सकता है, मगर पूर्णिमा की रात के साथ बेचैन हो जाएगा। पूर्णिमा की रात उसे उसके अंधेपन की याद दिलाएगी; अमावस की रात अंधेपन को भुलाएगी, याद नहीं दिलाएगी। मिठास के आदी हो गए तुम कहते हो, 'जीवन के हर आयाम म…

आजादी के मायने

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आजादी के 70 वर्ष: युवा पीढ़ी के लिए देश की तरक्‍की की कल्‍पना करना काफी मुश्किल Tue, 15 Aug 2017 12:48 PM (IST) नई दिल्‍ली (स्‍पेशल डेस्‍क)। आज के हिंदुस्तान की नौजवान पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना कठिन है कि आजादी के बाद सत्तर साल में देश ने कितनी तरक्की की है। जिन लोगों को ‘आधी रात की संतान’ कहा जाता है वह भी बुढ़ा चुके हैं और उनकी यादें भी धुंधलाने लगी हैं। जब हम स्वाधीनता की सालगिरह मनाने की तैयारी करते हैं तो कुछ युवा यह पूछने लगे हैं कि आखिर इतना जोश-ओ-खरोश किस लिए? रोजमर्रा की जिंदगी की मुसीबतों से परेशान तबका शिकायतों से ही फुर्सत नहीं पाता। उसे तिरंगा फहराना और लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधित करना एक रस्म अदायगी भर महसूस होता है। हमारी समझ में यह सोच ठीक नहीं। पीछे पलट कर देखें तो इस बात को नकार नहीं सकते कि हमने एक लंबा कठिन सफर तय किया है और बहुत कुछ हासिल किया है जिसका जश्न मनाना चाहिए। 1947 में औसत भारतीय सिर्फ सत्ताईस साल जिंदा रहने की अपेक्षा कर सकता था। आज वह 67-68 वर्ष की दहलीज छूने लगा है। प्लेग, चेचक, पोलियो जैसी महामारियों का उन्मूलन हो चुका ह…

आरक्षण

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आरक्षण पर उठते सवाल By-संजय गुप्त-दैनिक जागरण पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट जिस समय पदोन्नति में आरक्षण के मसले पर एक याचिका की सुनवाई करते हुए यह सवाल उठा रहा था कि आखिर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान क्यों नहीं लागू है, लगभग उसी वक्त राजस्थान विधानसभा में पांच अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने के लिए एक विधेयक पारित किया जा रहा था। राजस्थान पिछड़ा वर्ग विधेयक के तहत शैक्षिक संस्थाओं और नौकरियों में आरक्षण संबंधी विधेयक पारित होने के साथ ही राज्य में अन्य पिछड़े वर्गों का आरक्षण 21 प्रतिशत से बढ़कर 26 फीसद हो गया और कुल आरक्षण सीमा 50 से बढ़कर 54 प्रतिशत हो गई। इस विधेयक के पारित होते ही गुर्जर समुदाय समेत पांच जातियों को ओबीसी में पांच प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ अवश्य हो गया, लेकिन राजस्थान सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो हाईकोर्ट वैसे ही राजस्थान सरकार के इस फैसले को खारिज कर सकता है जैसे वह इसके पहले कर चुका है।हालांकि राजस्थान सरकार भरोसा दिला रही है कि इस बार अदालती समीक्षा में उसका आरक्षण संबंधी व…