Wednesday, 21 June 2017

योग दिवस- happy Yoga day

मित्रों  ....
आइए योग दिवस पर कुछ अनोखे आसनों का अभ्यास करें और बाबा के पतंजली brand से प्रेरणा लेते हुए। मुक्त व्यापार आसन को सफल बनाएँ।
     इस समय सर्वाधिक प्रचलित "आत्ममुग्ध सेल्फी मोड" आसन है। इसका सर्वाधिक विकार social network पर पाया जाता है। इसकी सफलता का आकलन like नामक लक्षण देखकर आँका जाता है। इस आसन को करने के लिए सिर्फ network युक्त camera phone की आवश्यकता होती है। और हाँ जितनी कम अक्ल होगी उतना ही अच्छा होगा।
      अब कुछ अन्य न किए जाने वाले आसन का सिर्फ जिक्र करते हैं क्यों कि सब जानते हैं बात निकलेगी तो ..।  वैसे इन आसनो की संख्या बहुत ज्यादा है। ऐसे में आप अपनी  सुविधा के अनुसार इन्हें श्रेणी बद्ध कर सकते है। फिलहाल कुछ महत्वपूर्ण आसन-
- भ्रष्टाचार मुक्ति आसन
- गरीबी निवारण आसन
- शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आसन
          सबसे जरूरी सद्भाव आसन है, क्यों कि जब तक समाज में एक दूसरे के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता का भाव नहीं होगा, तब तक कोई भी व्यक्ति सही अर्थों में योग नहीं कर पाएगा और सद्भाव न होने पर हमारा समाज पूरी तरह जड़ हो जाएगा क्यों कि आगे बढ़ने के लिए जिस तरह की नवीन चिंतन प्रक्रिया चाहिए उसके अभाव वह सिर्फ छोटी-छोटी अनावश्यक चीजों के लिए  संघर्ष करेगा। जिसमें हासिल करने के लिए कुछ है ही नहीं।
      योग का अर्थ स्वयं को परमात्मा और प्रकृति से जोड़ना है। जिसकी आवश्यक शर्त स्वयं को समस्त विकारो से मुक्त करना है। आज के हमारे विकार हैं- ......... .. सबको पता है, अपनी समझ के हिसाब से भर लीजिए।
  rajhansraju

Wednesday, 7 June 2017

पशुपालन के बहाने

पशुपालन जहाँ भी होता है, वहाँ कुछ चीजों की एक अनिवार्य  चक्रीय व्यवस्था कायम हो जाती है, जो उसे एक व्यापार का रूप देती है और इस चक्र के किसी भी कड़ी को तोड़ने से पूरा पहिया अव्यवस्थित हो जाता है। हम चाहे जितने भावुक हो लें और कैसे भी आदर्श का महिमा मंडन कर लें, अंततः चलता तो लाभ-हानि का खेल ही है। इसको हम narcotics के खतरनाक business से समझ सकते हैं। जो पूरी दुनिया में प्रतिबंधित है और सर्वाधिक कठोर सजाएँ इसी से जुडे अपराध में दी जाती हैं। इसके बावजूद भी हर गली-मुहल्ले में स्मैकिए मिल जाएँगे तो इसके पीछे मूल कारण, मुनाफा ही है। दुनिया में कोई भी किसान पशु पालन धर्मार्थ तो कर नहीं सकता। क्यों कि वह पहले से ही इतनी आर्थिक तंगी से जूझ रहा होता है कि वह किसी भी अनुत्पादक पशु का बोझ नहीं उठा सकता और उसे बेचने खरीदने लिए एक बाजार चाहिए। जहाँ वह अपने माल (किसान की भाषा में उसके पशु संपत्ति को यह भी कहा जाता है) का नवीनीकरण करता रहे। इस पूरी प्रक्रिया में कृषक, पशुपालक, दुग्ध व्यवसायी और इसके बाद चमडा, खाद उद्योग(fertiliser industry) आता है और ए सभी मिलकर एक चक्र का निर्माण करते हैं। अब सोचिए इसमें से कोई एक छोड़ दिया जाए यानी कोई एक कड़ी तोड़ दिया जाए तो इसका परिणाम क्या होगा? 
     अब पशु कटेंगे कहाँ? सिर्फ सोचने, समझने की बात यही है। क्यों कि जब जिंदा पशु से ज्यादा कीमत, मृत पशु की हो तो उसे बचाना नामुमकिन ही है।
      इसका एक मजेदार उदाहरण पाकिस्तान का है जहाँ 2015 में  गधों के चमड़े का निर्यात बेतहासा बढ़ गया और उसका गोश्त हर गोश्त में मिलाकर बेंचा जाने लगा तो इसकी वजह ... जो गधा कुछ सौ रुपयों में मारा-मारा फिरता था। चीन की कृपा से जैसे ही लोगों को पता चला कि उसके चमडे की कीमत 12000 से 15000 रुपये के बीच शुरू होती है। इस धंधे से जुड़े लोगों की लाटरी लग गयी।
( http://dunyanews.tv/en/Pakistan/296843-Export-of-donkey-skin-increases-Ishaq-Dar-approve)
      अब ऐसे में गधों की जान भला कौन बचा सकता है। फिर पशुओं के खुर और सींग का भी अच्छा खासा बाजार है।
      अब तय करिए कि हजारों करोड़ का व्यापार, आप किसके हाथ में देना चाह रहे हैं। पशु smugglers जिन्हें  सिर्फ सीमा पार(चाहे राज्य हो या फिर देश) कराना है या फिर बड़ी multinational कम्पनी जिसमें बड़े- बड़े नेताओं की हिस्सेदारी होगी और जहाँ सबकुछ जायज होगा। देश का खुद को खेवनहार समझने वालों अब कृपा करना बंद करो क्यों कि  शिक्षित, वैचारिक, वैज्ञानिक समाज के लिए हम पर्याप्त मूर्ख साबित हो चुके है। क्यों कि हम नई मान्यताओं और प्रतीकों को गढ़ने में नाकाम रहे हैं और अतीत में लौट जाना चाहते हैं। जबकी सच ए है कि हमने अपनी चिंतन प्रक्रिया खो दी है और नए ज्ञान खोज सकने की अपनी क्षमता पर भरोसा नहीं है। हम आज की दुनिया को कोई भी नया विचार देने में नाकामयाब रहे हैं और अपनी पीठ थपथपाने की अजीब बिमारी लग गयी है।
rajhansraju

Monday, 29 May 2017

कैसा सच? किसका सच?

पूरा सच... आधा सच .. सच के पहले और बाद का सच, इन सबके बाद भी सच का पता नहीं चलता कि आखिर किस बात को सच बनाया जा रहा है और जो मीडिया में दिखाया, बताया जा रहा है। वह तर्क, बुद्धि से परे निश्चित रूप से अविश्वसनीय है। उसका फोकस सिर्फ बाजार है और बाजार का संबंध मुनाफा से है। इसी कारण वह एक ही समय में beauty product, religion और आतंकवाद सबको दिखाता है क्योंकि सब कुछ बिक रहा है। बाजार में सबके लिए जगह है, बस उसकी packaging अच्छी होनी चाहिए। यह हो भी रहा है। पूरी दुनिया में आतंकवाद एक बड़ा व्यवसाय है, जो हथियारों की खरीद फरोख्त का पूरी तरह विकेन्द्रित तरीका है। जिसमें आतंकी संगठन पूरी तरह private company की तरह व्यवहार करते हैं और उसके सारे आदर्श मालिक के पक्ष में होते हैं। यह संगठन तब और अधिक सक्रिय हो जाते हैं, जब वह किसी खनिज संपदा वाले क्षेत्र पर काबिज हों या फिर इस जगह का सामरिक महत्व हो। तब तो वहाँ के लोगों की खैर नहीं और सच का अजब-गजब projection शुरू हो जाता है। किसका सच, कौन सा सच, सब प्रायोजित।
         खैर ज्यादातर लोग, जो इस तरह की गतिविधियों में शामिल होते हैं वो लोग बेमकसद ही होते हैं और थोड़े से मजे और रोमांच की चाहत में पागलपन की हरकते करने लगते हैं। जिसकी न तो कोई आवश्यकता होती है और न उस व्यक्ति के लिए ही कोई उपयोग होता है। वैसे ही जैसे पाँच सौ करोड़ की अधिक की सम्पत्ति जमा करने वाले वरिष्ठ अधिकारी, जो अपने जीवन काल में यह पैसा खर्च ही नहीं कर सकता ... वजह- बेचारे ने बचपन में बड़ी गरीबी झेली थी।
            लोगों के समझदारी का अति तब हो जाता है। जब हिंसक, भ्रष्ट और तमाम दूसरे तरह के अपराध करने वालों को मीडिया हीरो बनाने लग जाता है और बेचारा, मजबूर वाले tag का तो अपना ही मजा है। इनका बस चले तो हर अपराधी को संत से सम्बोधित करने लग जाए। बेचारा कितनी मेहनत से चोरी करता है क्योंकि ....
rajhansraju

Friday, 26 May 2017

सावधान! सामने! अपना नेता है!

अगर आप गाँव, मुहल्ला, शहर में सुख और शांति बनाए रखना चाहते हैं तो अधिकार और हक के नाम पर जागरूक करने वाले महान व्यक्तियों से सावधान हो जाइए, क्यों कि-
1- ए जिस हक की बात करते हैं। उसे अकेले ही  पूरा हडप लेते हैं।
2- इनकी बात आमतौर पर धार्मिक, जातीय खतरे से शुरू होती है। जिसमें अतीत की भयंकर या फिर स्वर्ण काल वाली व्याख्या होती है। इनका काम इनके भक्त या प्रशंसक से ज्यादा, आलोचक करते हैं।
3- ए वर्तमान शिक्षा, समाज, अवसर, इन विषयों पर कभी बात नहीं करते।
4- इनके विचारों में महिला तो हो ही नहीं सकती। अगर कोई डरावनी चीज है तो वह महिला ही है। उसका जिक्र आते ही बोलती बंद।
ऐसे में यदि यह आदमी धार्मिक या राजनीतिक getup में हुआ तो खतरा और बड़ा है।
सावधान हो जाइए और अपने गाँव, शहर को बचा लीजिए। ए  लोग अब जहाँ भी जागरूकता लाते हैं, वहाँ सिर्फ आग लगती है। पहले पुलिस ... फिर सेना आती है.. तब वह दिल्ली में बैठकर interview देता है और सबसे अच्छी जगह धरना और अनशन भी.. अंत मे एक अच्छा सा समझौता, विधान सभा, संसद की सीट पक्की, सुना है, भाई ने अभी हाल ही में एक आलीशान होटल खरीदा है और जहाँ जागरूकता अभियान चलाया था। वो बस्ती अब खाली है और भाई के partnership में किसी को वहाँ का ठेका मिल गया है। फिर चुनाव हुए, भाई के सामने सबकी जमानत जब्त हो गयी। भाई  अब राजा है, दरबार लगाता है, सब लोग मथ्था टेक रहे हैं, उसके कपड़ों का रंग और खिल गया है, लोगों को यही लगता है कि भाई  एक ही रंग में  बँधा है, जबकि भाई को पता है, कौन सा रंग? कहाँ, कितना कारगर है। लोगों ने अपने-अपने रंगों के सामने खूब तालियाँ बजायी। जबकि सभी रंग के भाइयों ने मिलकर पूरी रात जश्न मनयी।
rajhansraju

Wednesday, 24 May 2017

a platform to abuse

इस समय social network पर गाली गलौज करने वालों का कुछ खास तरह का ग्रुप खूब चल रहा है। जो फिलहाल कुछ इस तरह नजर आता है -
1- भक्त
2-जेहादी
3-दलित
4-ब्राह्मणवादी
5-समाजवादी।
इनका एक सूत्री काम अति साहित्यिक गालियों से सब को अवगत कराना है। साथ ही यह भी बताना है कि मै कितना काबिल हूँ और मै जिस परिवार, समाज का प्रतिनिधि होने का दावा करता हूँ, वहाँ से मैने क्या सीखा है। उनकी बात से इतना  तो साबित है कि ए पढ़ लिख सकने वाले भयानक जाहिल हैं। जिन्हें सच में, कुछ पता नहीं है और ए बेचारे किसी संगठन के pumplate को ही सम्पूर्ण साहित्य और अंतिम सत्य मान बैठते हैं। जबकि देखने, जानने, समझने को इतना कुछ है कि जरा सी आँख खोलते ही, मजहब और जातीय बोध से जुड़ी तमाम दुर्भावनाएँ ज्यादा देर तक टिक नहीं सकती। बस जरूरत इस बात की है कि न केवल आँख और दिमाग खोला जाय, बल्कि खास तरह के चश्मों से मुक्ति भी पायी जाए।
rajhansraju

Tuesday, 23 May 2017

आरक्षण राग

आरक्षण उस चीज का नाम है जो जातीय आधार पर लोगों को संगठित होने का अवसर देती है और ए संगठित समूह राजनीतिक दलों के लिए सबसे अच्छे वोट बैंक होते हैं क्यों कि इसके विरोधी और समर्थक दोनों घृणा की राजनीति में किसी खास दल की भक्ति कर रहे होते हैं। जबकि सरकारी नौकरियों की संख्या इतनी है ही नहीं कि किसी खास समुदाय का इससे विकास हो सके। आप किसी भी जाति से संबंध रखते हों परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए अतीत से संघर्ष करने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ टीना डाभी, शाह फैजल, अजीम प्रेमजी, शाहरुख, सचिन, लालू, मुलायम, माया, अमिताभ, दिलीपकुमार, .... या फिर नटवर लाल, छोटा राजन, दाऊद... केजरीवाल, अन्ना हजारे.. सब बनने की छूट है, मेहनत करिए और बन जाइए। आरक्षण बेमन से ही सही अब एक सर्व स्वीकार्य व्यवस्था बन चुकी है, पर समस्या यह है कि इस पर बात करने से पता नहीं क्यों लोग डरते हैं। इसका लाभ किस जाति को कितना हुआ, कौन सा समूह इतने वर्षों बाद भी समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाया। तो आरक्षण के अतिरिक्त दूसरे प्रयास भी करने होंगे और उपेक्षित, पीड़ित, शोषित की मानसिकता से मुक्त होने की जरूरत है। साथ ही संविधान और कानून पर भरोसा रखना होगा क्योंकि हमारे जो अधिकार है वह राजनीतिक दलों की खैरात नहीं है। ऐसे में दलों की मानसिक गुलामी से मुक्त होना भी जरूरी है कि हम चीजों का सही तार्किक विश्लेषण कर सकें न कि हम ऐसा इसलिए कहते हैं क्यों कि हम फला जाति के हैं और हम अपने लिए जिस हक की माँग करते है। अपने से दुर्बल को वैसे कोई हक नहीं देना चाहते।
rajhansraju

इसको पढ़ने के बाद हमारे एक मित्र को यह बातें, शायद किसी खास नजरिए के कारण उतनी सही नहीं  लगी। अब हर बात से सहमत होना जरूरी भी नहीं है, उनका मानना है कि आरक्षण समान प्रतिनिधित्व के लिए है, मतलब ... ? शायद जाति को सदा के लिए बनाए रखने की ही बात हैं और आर्थिक रूप से सम्पन्न हो चुके लोग, जो खुद को दलित चिंतक या नेता मानते हैं। वो दलित बने रहने के लिए ज्यादा परेशान हैं। तो इसका वजह, वही उनका ब्राह्मण वाद है, जिसमें ए भी अपने से कमजोर लोगों को हक नहीं देना चाहते।
                    इसीलिए हमें राजनीतिक तौर पर यही बोध कराया जाता है। जिससे दलित हमेशा दलित बना रहे और जो उसका हक है। वह उसे दान जैसी चीज मानता रहे, फलाने मंदिर में आने दे, फलाने छूने दे.. जबकि समस्या के मूल में स्वाभिमान और सम्मान है।जिसे खुद हासिल करना होगा और अब हमें वर्तमान की आदत डालनी होगी। अतीत की व्याखाओं से मुक्त होना होगा, हम चाहे जिस जाति समुदाय से संबंध रखते हों हम अतीत में नहीं लौट सकते। हमें किसी का मोहताज नहीं होना है और "भारत" हमें यह ताकत देता है कि हम जितना चाहें आगे बढ़ सकते है।
          हाँ ए भी सच है कि ढेर सारी समस्याएँ हैं, फिर भी हम आगे बढ़ रहे हैं। सत्तर साल की उम्र किसी व्यक्ति के लिए काफी ज्यादा हो सकती हैं, पर किसी देश के लिए बहुत ही कम है। अभी भी हम एक देश बनने की प्रक्रिया में ही हैं। इसके लिए संविधान और कानून में  विश्वास बनाए रखना होगा। चंद राजनीतिक परिवर्तनों से लोगों को परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। भारत के लोकतंत्र की यही ताकत है कि BSP अकेलेदम बहुमत पा सकती है तो BJP रिकॉर्ड तोड़ सकती है।
       मित्र पुनः पढ़ें आरक्षण का कोई विरोध नहीं है। बस उसको सही और न्याय संगत बनाने की बात हो रही है। रही छुआ छूत और जातीय श्रेष्ठता के बोध की बात तो- खेत, किसान और गाँव तीनों का अस्तित्व संकट में है, शहर सबको निगल रहा है और अब मजदूर, मालिक के संबंध की शुरुआत हो चुकी है और  मजदूर  मिलना आसान नहीं है, fooding, lodging सारा काम Labour के हाथ में है और Labour की जाति.... ???? वही गरीब, लाचार, दलित ..
rajhansraju

Wednesday, 17 May 2017

वाद की राजनीति

आज एक फेसबुक मित्र की वाल पर कथित घनघोर अश्लील  हिन्दू धार्मिक साहित्य के दर्शन हुए। उनका परिश्रम सराहनीय है कि उन संस्कृत रचनाओं को हमारे समक्ष हिंदी अनुवाद के साथ उपलब्ध कराया क्यों कि कथित सही जात होने के बाद भी हमारे कुल परिवार और पूरे गाँव में शायद ही कोई संस्कृत श्लोकों का हिन्दी में सही मतलब बता सके। पढ़ तो फर्राटे से लेंगे बस देवनागरी में लिखा भर हो। हाँ एक बात और बतानी है कि हिन्दी भाषी घरों में तुलसी दास कृत "रामचरित मानस" के अलावा शायद ही कोई धार्मिक ग्रंथ हो, जिसका सर्वाधिक विरोध काशी के ब्राह्मणों ने किया था, जो उस वक्त के हिन्दी क्षेत्र की जनभाषा अवधी में थी, जिसने ब्राह्मणों के हाथ से रामकथा छीन ली और सबसे खतरनाक धर्म ग्रंथ "मनु समृति" का नाम सिर्फ शहरी पढ़ा लिखा वर्ग ही जानता है और इस किताब को हमने तो आज तक किसी घर में नहीं देखा वैसे भी किसी खास जात के उत्पीडन के लिए किसी खास जात को, कोई खास किताब पढ़नी पड़ती हो, इसकी आवश्यकता नहीं है। उसका संबंध तो सिर्फ सत्ता और ताकत से है जिसके मिलते ही आदमी शोषण के शोधित तरीके ढूँढ लेता है। वैसे इस किताब का घनघोर विरोध करने वालों को इसे एक बार जरूर पढ़नी चाहिए। खैर इस मनोरंजक साहित्य के लिए मित्र आपका आभार और पूरी उम्मीद है कि आगे भी आप इस तरह का मनोरंजन हमारे सामने लाते रहेंगे।
         चलिए अब पूरी बात को एक और नजिरिए से देखा जाय, मतलब कथित धार्मिक साहित्य में भी हिंदी सिनेमा की तरह पूरे मनोरंजन की व्यवस्था, मजेदार है, इस तरह की रचनाएँ वैसे आज के porn जैसी ही थी, जिसे चोरी छुपे हर आदमी पढ़ना, देखना, सुनना चाहता है। बस इंटरनेट के आ जाने से छुपने-छुपाने को कुछ नहीं बचा। अब कामसूत्र और कोक शास्त्र को भी आसानी से ढूँढा जा सकता है। वैसे मित्र खजुराहो की मूर्तिकला को बापू भी आज के बाकी विद्वानों की तरह ही नष्ट करने के पक्ष में थे पर दुर्भाग्य से कला और साहित्य की समझ रखने वाले गुरू देव रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने टाँग अडा दी और उनको भी गुरू देव की बात समझ आ गयी। यह कुछ- कुछ M.F. Husain की paintings को अश्लील समझने वाले महाज्ञानियों की तरह ही है। आगे अजंता-एलोरा की कला का जिक्र भी होना चाहिए जो किसी एक पंथ से जुड़ा हुआ नहीं है, भाई बच्चे तो सारे मजहब और जाति के लोग पैदा करते हैं और प्रजनन के प्रतीक की पूजा पुरातन और आदिम है, जिसके खोज का श्रेय ब्राह्मणों को कदापि नहीं देना चाहिए और शिव के दूसरे पर्यायवाची भी हैं जो जंगल, जमीन, वृक्ष, पशु, पक्षी, आखेट आदि से जुड़े हैं, जो बिलकुल भी राजनीतिक ब्राह्मण वाद से मेल नहीं खाते, पर ब्राह्मणों की चालाकी समझने लायक है, इस आदिम देवता को भी उन्होंने हडप लिया और इसके लिए शिव पुराण रच डाला और हाय रे दुर्भाग्य जिन्होंने शिव को गढ़ा था उन्हें पता ही नहीं चला  कि कब उन्होंने उसे अपना मानना बंद कर दिया। हलाँकि यह "न मानने" का प्रदर्शन खुद को मनवाने का एक तरीका है, अगर आप किसी धार्मिक रीति रिवाज को नहीं मानते तो इसका ढिंढोरा पीटने की क्या जरूरत है यह तो हमारा व्यक्तिगत मामला है वैसे ही जैसे कौन किस रंग की चड्ढी पहनता है किसी और से मतलब नहीं होना चाहिए।
      नास्तिक होने में कोई हर्ज नहीं है वैसे ही आस्तिक होने में भी कोई हर्ज नहीं है वैसे भी हमारे पास जो अधिकार हैं वह संविधान और कानून की वजह से हैं इसलिए किसी धर्म ग्रंथ या वाद का हमारे जीवन में ऐसा कोई अर्थ नहीं है जो हमारे जिंदा रहने की अनिवार्य शर्त हो, इन्हें मानने न मानने के लिए हम पूरी तरह आजाद हैं। हाँ! "मै नास्तिक हूँ" और यह मेरा व्यक्तिगत चुनाव है, पर यह नास्तिकता कोई संघर्ष करके हासिल करने वाली चीज नहीं है, मेरे लिए इसका अर्थ सिर्फ उदार होना है जो हर तरह के प्रतीक और साहित्य को देख समझ सके, उनसे बिना डर या घृणा के, जिसमें नास्तिक होने का बोध या कट्टरता भी न हो, अन्यथा यह नास्तिकता भी एक धार्मिक सम्प्रदाय बन जाएगा और पता नहीं किससे-किससे संघर्ष करता दिखाई देगा। बहुत सारी चीजें हमारे अतीत का हिस्सा है कि हम क्या थे और हम चीजों को उस वक्त कैसे देखते समझते थे, वह अध्ययन, शोध और यहाँ तक कि मनोरंजन का विषय हो सकता है पर उसके लिए हमें अपने वर्तमान की कुर्बानी नहीं देनी चाहिए। यहाँ हमारी मनोवृत्ति खुद को विकसित करने के बजाय दूसरों को नीचा दिखाने और बदला लेने की ज्यादा है, हम चाहे जिस समुदाय से संबंध रखते हो इससे फर्क नहीं पड़ता, दलित-सवर्ण, हिन्दू-मुस्लिम सब शोषण से मुक्ति तो चाहते हैं, पर ज्यादातर बनना शोषक ही चाहते हैं। शायद इसी लिए कोई भी समुदाय अपनी महिलाओं के बारे में बात नहीं करना चाहता क्यों कि आज तक दुनिया के किसी भी समुदाय ने उन्हें कोई आजादी नहीं दी और सारे जातीय, धार्मिक, कायदे कानून उसी के खिलाफ हैं।
     रही बात आज के हिन्दू धर्म की तो उसमें जात की निर्णायक राजनीतिक भूमिका समस्या के मूल में है। हर समाज की तरह शोषित, उपेक्षित लोग हैं और आगे भी रहेंगे उनका नाम और क्षेत्र बदल सकता है क्योंकि हमारे यहाँ अशिक्षा, गरीबी राजनीतिक दलों के लिए वरदान है क्योंकि यह लोगों को जात, धर्म के आधार पर संगठित करने और रखने का मूल आधार है और इसीलिए जब  ब्राह्मणवादी या दलित चिंतक हिन्दू धर्म की आलोचना या प्रशंसा करते हैं तो वह कभी उपनिषदों की बात नहीं करता और भागवत गीता की तो भूलकर भी न तो चर्चा करता है और न ही कभी उसके अर्थ बताता है। भाई दोनों अपने धंधे  बंद करने से रहे।
rajhansraju